दर्द का वो एक लम्हा, जो जाते जाते गहरा ज़ख्म दे गया
वो आंसूं, जो बह गए पर अपने निशाँ छोड़ गए
वो ज़हन में डर जो जा के भी न गया
सब गवाह हैं मेरी कोशिशों के, जो कभी हारी नहीं
उन ज़ख्मों पर वक़्त ने ही नमक तो कभी मलहम लगाया
उन्ही आंसुओं को पीकर हमें जीना भी आया
उस डर से लड़ लड़ कर ही तो मैंने वक़्त बिताया
कोशिशें ही तो की और कहीं दूर चला आया
वो कहते हैं कि मैं आज कामयाब, मशहूर हूँ
वो कहते हैं की मैं उस खुदा का ही नूर हूँ
करते हैं तारीफें मेरी, सुनाते हैं किस्से मेरे
वो जानते नहीं कि मैं आज भी बेबस, मजबूर हूँ
Sunday, January 1, 2012
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